अग्निवीर योजना; एक छद्म छलावा

 

अग्निवीर योजना; एक छद्म छलावा

अग्निवीर योजना; एक छद्म छलावा

अग्निवीर योजना

अग्निवीर योजना सरकार द्वारा विश्व के सर्वश्रेष्ठ सेनाओं में से एक भारतीय सेना की मूलभूत संरचना के साथ खिलवाड़ जैसा प्रतीत होता है।  भारतीय सेना जैसी परिपक्व और सशक्त सेना आज विश्व में देखने को नहीं मिलती। भारतीय सेना की परिपक्वता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में आज तक किसी भी सेनानायक ने देश की सत्ता और राजनीति की तरफ आंख उठाकर भी नहीं देखा। मगर गजब देश है भारत, यहां उन महान वीर सैनिकों के अस्मिता के साथ खेला जा रहा हैं। मां भारती के सच्चे सपूत सैनिकों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। भारतीय सेना को अपंग और अपरिपक्व बनाने का गहरा विदेशी षड्यंत्र रचा जा रहा है। 

70 साल के प्रधानमंत्री चाहते हैं कि युवा 24 वर्ष में पद मुक्त हो जाएं और ग्राम प्रधान से लेकर विधायक और सांसद की पेंशन लेने वाले यह राजनेता अपनी पेंशन को यूं ही बरकरार रखें और अपना सर्वस्व निछावर करने वाले वीर सैनिकों की पेंशन को समाप्त कर दिया जाए। अंततः इन राजनीतिक दलो और नेताओं ने सैनिकों को मिलने वाला पेंशन बंद करने का पूरा बंदोबस्त कर लिया है। मान लीजिए कि एक बच्चा है वह 18 वर्ष की उम्र में भारतीय सेना से जुड़ जाता है और  अग्निवीर योजना के माध्यम से वह 22 और 23 वर्ष की उम्र में वहां से रिटायर्ड भी हो जाता है, तो वह आगे अपनी जिंदगी में क्या करें? उस दौर में बच्चों की मनोस्थिति बिल्कुल अलग होती है और यह जॉब की अस्थिरता उनकी मानसिकता पर दबाव देंगे और शायद वह 25% की रेस में नहीं रह पाने के गम में कुछ कर बैठे। क्योंकि सरकार ने तो कह दिया कि सिर्फ 25% सैनिकों को ही परमानेंट किया जाएगा और बाकी लोगों को अग्निवीर सर्टिफिकेट और ढेर सारी आशाओं के साथ उसको विदा कर दिया जाएगा। क्या यह बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं है। 

युवाओं ने किया विरोध प्रदर्शन

70 और 80 की उम्र में मंत्री और प्रधानमंत्री बने रहने वाले यह नेता आज युवाओं के बचपने को छीनना चाहते हैं। यह चाहते हैं कि बच्चे 24 वर्ष में बेरोजगार हो जाएं और फिर इनकी पार्टी का झंडा उठाकर इनके आगे पीछे घूमते रहें।  

यह नेता अपने बच्चों को तो विदेश बड़ी-बड़ी डिग्रियों के लिए भेजते हैं, मगर जब देश पर मरने का वक्त आता है तो इनको सैनिक ही याद आते हैं। और उस पर भी सैनिकों के साथ यह हो रहा खिलवाड़ किसी अंतरराष्ट्रीय साजिश का हिस्सा प्रतीत होता है, क्योंकि भारत देश आज अपने सैनिकों के बलबूते पर खड़ा है, किसी राजनेता और किसी नौकरशाह के बलबूते पर नहीं। गजब के रक्षा मंत्री और गृह मंत्री हमारे देश में हुए हैं, जिन्हें यह उग्र प्रदर्शन तक नहीं दिखते। 

शायद सत्ता में बने रहने का घमंड सर चढ़कर बोल रहा है। इसी वजह से उनको कुछ नहीं दिख रहा कि किस प्रकार बच्चे व्याकुल हैं और किस प्रकार उन्होंने हिंसा का रास्ता तक अपनाया है। अपितु यह कह दूं कि हिंसा किसी भी प्रदर्शन में स्वीकार नहीं है, लेकिन हमें उनकी भी मनोस्थिति को  समझना होगा, जो आज मरने और मारने पर उतारू हो गए हैं।

 जो बच्चे 3 साल और 4 साल से सेना में भर्ती होने के लिए रोज कसरत और दौड़ लगा रहे थे और लगातार तीन साल से कोरोना वायरस के कारण भर्तियां कैंसिल होती जा रही थी और उनको उम्मीद थी कि अब कोरोनावायरस के खत्म होने के बाद सेना अपनी नियमित प्रक्रिया से भर्ती जारी रखेगी और उनको मां भारती की सेवा का अवसर प्रदान होगा, वह भी सैनिक वाली भर्ती अपनी छाती से लगाकर मां भारती को सैल्यूट करेंगे, लेकिन निकम्मी सरकारों ने उन्हें दिया तो क्या दिया बस 4 साल सेना में रहने का लॉलीपॉप, जिसे हर किसी ने सिरे से खारिज कर दिया है। 

आज भारत उबल रहा है, अंदर ही अंदर जल रहा है। युवाओं के अंतर्मन को अग्निवीर योजना ने बहुत ही बुरे तरीके से कचोटा है और युवा आज इतने आक्रोशित हैं कि उनको हिंसा के अलावा कोई और रास्ता नहीं दिख रहा है। मुझे लगता है कि जो बच्चे हिंसा आज कर रहे हैं, उनको सजा ना देकर इन नेताओं को सरेआम सजा मिलना चाहिए, क्योंकि यहीं उस हिंसा की मूल वजह हैं। यह सत्ता पर बैठने वाले सत्ताधीश क्यों भूल जाते हैं कि ये सिर्फ 5 साल के मेहमान हैं। क्यों यह गरीब किसान और जवानों की बात नहीं सुन पाते हैं? क्यों इतने अहंकारी हो जाते हैं कि आम जनता की बात उनके कानों तक नहीं पहुंचती। अग्निवीर योजना एक खोखली योजना प्रतीत होती है, जिसमें की फायदे तो ना के बराबर हैं, लेकिन नुकसान सैकड़ों में है। अब तरह-तरह कि बातें सामने आ रही हैं कि सशस्त्र सेनाओं की भर्तियों में अग्नि वीरों को 10% की छूट मिलेगी। लेकिन सवाल फिर यही उत्पन्न होता है कि उन सशस्त्र सेनाओं में भी ना जाने ऐसी अग्निवीर योजना कब शुरू हो जाए? फिर यह भारत का युवा जाएगा कहां जायेगा। 

भारत ऐसा देश जहां कि हर युवा चाहता है कि वो अपनी मिट्टी अपनी मां अपने देश की सेवा में समर्पित हो और अपना सर्वस्व निछावर कर दें। वैसे निष्काम और प्रबुद्ध युवाओं के साथ यह सरकार का सौतेलापन बड़ा अप्रिय प्रतीत होता है।

 सत्तामद में अहंकारीत हुए सत्ताधीशो को यह प्रतीत होना चाहिए कि युवाओं को नौकरी देने में वह विफल रही है। साथ ही साथ महंगाई अपने चरम सीमा पर है, दंगे फसाद देश में आम बात हो गई है। ऐसे में सैनिक धरे को कमजोर करना कौन सा मास्टर स्ट्रोक साबित होगा यह तो वक्त बताएगा, लेकिन समय की मांग है कि ऐसी योजनाओं को वापस लेकर सेना के मामलों में सरकार ज्यादा दखलअंदाजी ना करें। क्योंकि सेना बहुत ही अनुशासित और संगठित संगठन है जहां पर नेताओं का जितना कम दखल हो उतना अच्छा। 

साथ ही साथ जितने भी युवाओं पर आगजनी,दंगा-फसाद और प्रदर्शन के नाम पर केस रजिस्टर्ड किए गए हैं, उन सभी को वापस लेकर शांतिपूर्ण ढंग से इस योजना को वापस लिया जाए। जिस प्रकार किसान बिल को वापस लिया गया था। क्योंकि हमारे प्रधानमंत्री की तपस्या में फिर से कमी आ गई और फिर से इस बार उनको यह कानून जो कि हमारी नजर में काले कानून है, इसको वापस लेकर देश के भविष्य, युवाओं को शांत करना चाहिए और सैनिक धरे को मजबूत बनाए रखना चाहिए। 

सेना में जो रेजिमेंट हैं उनकी बनावट के साथ छेड़छाड़ पूरे सैनिक अनुशासन को तोड़ने जैसा होगा। रेजीमेंट्स अंग्रेजों के जमाने से चले आ रहे हैं जो कि बहादुरी और संगठनात्मक सैलरी के लिए जाने जाते हैं। इसीलिए सैनिक और सेना में सरकार का जितना कम दखल हो उतना बेहतर। युवाओं को रोजगार के नए अवसर प्रदान करना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। सैनिकों को पेंशन और जॉब सिक्योरिटी देना राष्ट्र कि सरकार का परम दायित्व होना चाहिए। सेना के जानकारों के अनुसार सेना के रेजीमेंट्स की यथास्थिति बरकरार रखने में ही देश और सेना दोनों की भलाई है। सरकार को आगे आकर इस कानून को वापस लेना चाहिए और युवाओं के बीच एक संदेश देना चाहिए कि सरकार उनकी हितैषी है ना कि उनका दमन करने वाली।

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