Srilanka Crisis: श्रीलंका में जनता ने किया विद्रोह, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति हुए फरार;

Srilanka Crisis: 
जहां सत्ता के शीर्ष पर सिर्फ एक परिवार का कब्जा हो। राजपक्षे परिवार श्रीलंका के लोकतंत्र रूपी मुखोटे के पीछे अपना राजतंत्र चला रहे थे। जहां पर वही राजा थे, वही मंत्री थे और वही संत्री थे। ऐसे देश की स्थिति क्या हो सकती है अब खुद सोच सकते हो;

Srilanka Crisis


श्रीलंका में जनता का विद्रोह:

कर्ज के चक्रव्यूह में फंसे श्रीलंका की जनता आज सड़कों पे उतरी है। अपनी चुनी हुई सरकार के खिलाफ उसने विद्रोह कर दिया है। प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति अपने आवासों को छोड़कर भाग चुके हैं और प्रदर्शनकारी राष्ट्रपति भवन के स्विमिंग पूल में नहाते दिख रहे हैं, डिनर हॉल में खाना खाते दिख रहे हैं और गार्डन में घूमते दिख रहे हैं। यह आक्रोश श्रीलंका के दिवालिया हो जाने के कारण उत्पन्न हुई है। 

श्रीलंका अपनी जरूरत से ज्यादा खर्च करने लगा था और आमदनी उसकी सीमटती जा रही थी। इसमें कोई शक नहीं है कि कर्ज लेकर घी पीने वालों के बारे में ग्रामीण अंचल में बहुत सी बातें कही जाती हैं, लेकिन आज इसका यह प्रत्यक्ष प्रमाण भी दिख गया कि सचमुच जो व्यक्ति या राष्ट्र कर्ज लेकर काम करते हैं, वह कभी सकारात्मक दृष्टिकोण से विकास नहीं कर सकते। क्योंकि कर्ज लेने की भूख बढ़ती जाती है और ना चुकाने पर सब कुछ खत्म भी होने लगता है। 

चीन के कर्ज के जाल में फंसा श्रीलंका:

चीन के कर्ज के दुष्प्रभाव में फंसकर श्रीलंका ने अपने देश के आम जनता को विद्रोह करने पर मजबूर कर दिया। चालाक चीन हमेशा से छोटे और गरीब देशों को पैसों की धौंस दिखाता है और विकास के नाम पर उन छोटे देशों को बेशुमार पैसा कर्ज के तौर पर प्रदान कर के वहां इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट करने का ढोंग करता है। और जब वह राष्ट्र इनके कर्ज को चुका नहीं पाता, तो चाइना उस देश के उस इंफ्रास्ट्रक्चर पर अपना कब्जा कर लेता है।और यही सब कुछ भारत के पड़ोसी राष्ट्र श्रीलंका के साथ भी हो रहा है। श्रीलंका आज चीन की कठपुतली बन चुका है। चीन के बेशुमार कर्जे के तले आज श्रीलंका बुरी तरह से दबा हुआ है। 

परिवारवाद का चक्रव्यूह :

गौर करने वाली बात है कि श्रीलंका की चुनी हुई सरकार किस तरह लोकतंत्र का गला घोट कर, देश में परिवार तंत्र चला रहे हैं। इतने बड़े राष्ट्र जो की विविधताओं से भरा हुआ है, उसमें सिर्फ एक महिंद्रा राजपक्षे का परिवार राजा बना हुआ था। कभी उनके भाई, कभी उनके भतीजे, कभी उनके चाचा तो कभी उनके भांजा प्रधानमंत्री-राष्ट्रपति और बाकी के मंत्रिमंडल के सदस्य बनते हैं। ऐसा परिवारतंत्र और परिवारवाद शायद किसी राष्ट्र में देखने को मिलता है। जहां सत्ता के शीर्ष पर सिर्फ एक परिवार का कब्जा हो। राजपक्षे परिवार श्रीलंका के लोकतंत्र रूपी मुखोटे के पीछे अपना राजतंत्र चला रहे थे। जहां पर वही राजा थे, वही मंत्री थे और वही संत्री थे। सत्ता के शीर्ष पर बैठे राजपक्षे परिवार की गलतियां आज देश पर भारी पड़ रही है। 

आज देश विखंडित होने की स्थिति पर हैं। जनता त्राहिमाम-त्राहिमाम कर रही है। चारों ओर मातम पसरा हुआ है। खाना और जरूरी वस्तुओं की कमी हो रही है। जरूरी सामानों का आयात रुक चुका है। लोग दो वक्त की रोटी के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं। और यही कारण है कि आज श्रीलंका की जनता सड़कों से राष्ट्रपति भवन तक विरोध प्रदर्शन कर रही है। और जनता का यह रौद्र रूप देख वहां के राष्ट्रपति ने दिखावा करने के लिए इस्तीफा भी दे दिया है। और एक सर्वदलीय सरकार के गठन की रूपरेखा तैयार करने को कहा है। उन्होंने आगे कहा कि सर्वदलीय सरकार समूचे राष्ट्र को एकत्र और अक्षुण बनाने में सहयोगी होगी और जनता के लिए हितकारी होगी।

 फिर प्रश्न यह उठता है कि जब सर्वदलीय सरकार हितकारी है, तो क्या राजपक्षे परिवार जो कि सत्ता के शीर्ष पर काफी वर्षों से बैठे हैं, उनके राष्ट्र निष्ठा में कमी है? क्या वह सरकार सही से नहीं चला सकते हैं? यह तो आत्ममंथन का विषय है। यह आत्ममंथन राजपक्षे परिवार और श्रीलंका की जनता को करना है। लेकिन इस स्थिति की भयावहता को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि जितनी चादर हो उतना ही पैर पसारना चाहिए। कर्ज लेकर घी नहीं पीना चाहिए। अगर आवश्यकता हैं तो उसके लिए संघर्ष करना चाहिए और पुरुषार्थ हो, तो उसका अर्जन करना चाहिए। यह सीख हमें पड़ोसी राष्ट्र से मिल रही है। लेकिन अगर हम सचेत नहीं हुए, तो यह स्थिति हमारे देश में भी देखी जा सकती है। क्योंकि हमारे देश के भी कुछ राज्य इसी तरह कर्ज  लेकर इंफ्रास्ट्रक्चर को तैयार कर रहे हैं। जो कि राष्ट्र के लिए घातक है और केंद्र सरकार को इस पर एक एडवाइजरी जारी करके, इसका निरीक्षण करके और इसे रोकने की प्रक्रिया को शुरू कर देना चाहिए। अंत में हम और हमारा यह राष्ट्र भारत श्रीलंका में स्थितियां सामान्य हो ऐसी कामना करते हैं।

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